चित्तौडगढ़

चित्तौड़ दुर्ग पर सबसे ऊंचाई पर स्थित है राजटीला जो गवाह है मेवाड़ शासकों के राजतिलक का

आकोला(नवरतन जैन) ।
विश्व प्रसिद्ध चितौड़ दुर्ग अनगिनत एतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा है। विशाल क्षैत्र में फैले इस दुर्ग के चप्पे चप्पे पर अतीत का इतिहास पसरा और बिखरा पड़ा है, इतिहासकारों एवं पुरातत्व विदो के लिए यह दुर्ग हमेशा खोज का विषय रहा है। यहां की प्राचीन ऐतिहासिक धरोहरें चितौड़ किले की वैभवशाली अतीत की कहानी कह रही है। दुर्ग पर दक्षिण पूर्व दिशा की ओर कई प्राचीन स्थान है जो देखने लायक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है लेकिन इस भाग में पर्यटक कम ही आते है। कहा जाता है कि सबसे पहले चितौड़ किले की स्थापना इसी क्षैत्र में हुई थी। हम आपको इसी भाग में स्थित सबसे ऊंचे पहाड़ के टीले पर ले चलते हैं। हालांकि यह दूर से दिखाई नही देता और पास की सड़क से गुजरते वक्त सिर्फ एक दीवार जरुर नजर आती है। पास में झाड़ियों से होकर एक कच्चा रास्ता है, जिससे होकर हम इस टीले पर पहुंचते हैं। एक विशाल चबूतरा बना हुआ है उस पर चढ़ने के लिए कुछ सीढ़ियां बनी हुई है। इसके उत्तर में एक बड़ा प्रागंण है जिसके बीच में पत्थरों से रास्ता बना हुआ है,जो सीढ़ियों से शुरू होकर प्रागंण से कुछ आगे झाड़ियों में जाकर औझल हो जाता है। इस चबूतरे को ही राजटीला कहा जाता है। हालांकि यहां सूचक बोर्ड लगा हुआ नही है। ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन समय में इस राजटीले पर ही चितौड़ शासकों के राजतिलक की रस्में आदि कार्यक्रम होते थे इस दौरान शायद राजपरिवार के सदस्य व दरबारी आदि खास लोग इस विशाल चबूतरे पर विराजते थे और प्रजा नीचे प्रांगण में जुटती थी। राजटीले पर खड़े होकर देखने पर पूर्व की ओर का दूर दूर तक का खूबसूरत नजारा देखते ही बनता है। यहां से सूर्योदय का नजारा तो बेहद मनमोहक दिखता है। हो सकता है शायद उस काल में शासकों का राजतिलक भी सूर्योदय की साक्षी मे होते रहे हो।

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