फतहनगर - सनवाड

फतहनगर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गुरु पूर्णिमा उत्सव संपन्न


फतहनगर।
स्थानीय विद्यानिकेतन विद्यालय के सभागार में शनिवार शाम 7:00 बजे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गुरु पूर्णिमा उत्सव परंपरा एवं हर्षोल्लास के साथ आयोजित किया गया। परम पूज्य भगवा ध्वज के सानिध्य में आयोजित इस कार्यक्रम में स्वयंसेवकों ने ध्वज प्रणाम, प्रार्थना तथा समर्पण कर भगवा ध्वज के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा प्रकट की।

परम पूज्य भगवा ध्वज ही संघ का सर्वोच्च गुरु

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता (बौद्धिक प्रमुख) ने अपने ओजस्वी बौद्धिक संबोधन में गुरु पूर्णिमा के महत्व और संघ की परंपरा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के पश्चात जब संस्थापकों एवं कार्यकर्ताओं के समक्ष मार्गदर्शक चुनने का विषय आया, तब गहन चिंतन-मनन के बाद व्यक्तिपूजा के स्थान पर विचार और आदर्शों के प्रतीक ‘भगवा ध्वज’ को गुरु के रूप में स्वीकार किया गया।
बौद्धिक प्रमुख ने स्पष्ट किया कि व्यक्ति में चाहे कितने भी श्रेष्ठ गुण हों, किंतु कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं हो सकता; पूर्णता केवल ईश्वर में होती है। इतिहास गवाह है कि विश्वामित्र जैसे महान तपस्वी भी अपने जीवन काल में विचलित हो गए थे। इसी कारण संघ ने अनित्य व्यक्ति के स्थान पर सनातन काल से भारत की त्याग, ज्ञान और तपस्या का प्रतीक रहे भगवा ध्वज को अपना पथ-प्रदर्शक व सर्वोपरि गुरु माना।

वास्तविक समर्पण और त्याग का महत्व

मुख्य वक्ता ने समर्पण के मर्म को समझाते हुए कहा कि सच्चा समर्पण केवल धन का अंश देना नहीं, बल्कि गुरु के प्रति कृतज्ञता और भाव प्रकट करना है। उन्होंने भगवान बुद्ध और एक निर्धन वृद्धा का प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि जहाँ धनवानों के बहुमूल्य हीरे-जवाहरात की तुलना में उस वृद्धा का संपूर्ण भाव से अर्पित किया गया ‘आधा फल’ श्रेष्ठ साबित हुआ, क्योंकि उसमें वृद्धा का सर्वस्व समर्पण था।
इसी क्रम में उन्होंने त्याग के विभिन्न उदाहरण दिए:

  • भगवान महावीर का जीवन: जिन्होंने संपूर्ण भौतिक सुखों का त्याग कर त्याग का मार्ग दिखाया।
  • दानवीर भामाशाह का त्याग: मेवाड़ की भूमि पर राष्ट्र रक्षा हेतु अपनी संचित पूंजी शासक को समर्पित कर देशप्रेम का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।
  • महर्षि अगस्त्य की तपस्या: जिन्होंने समाज और राष्ट्र कल्याण के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

भगवा ध्वज: अग्नि की ज्वाला एवं त्याग का स्वरूप

बौद्धिक प्रमुख ने कहा कि हमारी संस्कृति में अग्नि की उठती हुई ज्वाला और संत-महात्माओं का गेरुआ वस्त्र त्याग की पराकाष्ठा को दर्शाता है। भगवा ध्वज हमें हर क्षण समाज कल्याण, राष्ट्र रक्षा और निस्वार्थ भाव से सर्वस्व अर्पित करने की प्रेरणा देता है।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित सभी स्वयंसेवकों ने राष्ट्र सेवा और समाज संगठन का संकल्प दोहराया।

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