देश प्रदेश

रूप चतुर्दशी और पुष्‍य स्‍नान से सौंदर्य विधान

•श्रीकृष्ण “जुगनू”
चौदह की संख्या लोक, आलोक, इंद्र, मनु, विद्या, रत्न आदि की पर्याय मानी गई है। चौदस भी इनकी प्रतीक और इनके गुण धर्म वाली तिथि है। रूप और सौंदर्य से इसका संबंध चौदहवीं का चांद जैसी उपमा से ही नहीं, रूप चौदस जैसे बनाव सिंगार से भी है।

नरकासुर की पौराणिक कथा के साथ लोक जीवन में यह पर्व स्‍नान, सौन्‍दर्य और सुख संचय का पर्व है। याद आते हैं वे सन्‍दर्भ जिनसे ज्ञात होता है कि अभिजात्‍य कुलों में परिचारिकाएं बनाव शृंगार की सामग्री लिए वधू के दायें-बायें रहती थीं। शृंगार मंजुषाएं उनके हाथ में होती थी और मूर्घ्‍नाशृंगी से लेकर नाना प्रकार के सुगन्धित चूर्ण, आलता, अभ्यंग सामग्री आदि लिए वे रुचि और ऋतु के अनुकूल शृंगार कार्य करती थीं। कभी रूपसत्र का विवरण देखा है! कांदर्पिका का अध्याय देखा है! प्रसाधन और गंधयुक्तियां नज़र से निकली हैं। भारत ने संसार के सामने सौंदर्य के लिए मानक विधान दिए हैं।

पूर्वकाल में पुष्‍य स्‍नान नामक अनुष्‍ठान बहुत ही लोकप्रिय था। यह संभ्रांत परिवारों, खासकर शासक वर्गों में प्रचलित था और बहुत विधिपूर्वक होता था। इसमें कांगुुनी, चिरायता के फल, हरड़, अपराजिता, जीवन्‍ती, सोंठ, पाढरि, लाज मंजिठा, विजया, मुद्गपर्णी, सहदेवी, नागरमोथा, शतावरी, रीठा, शमी, बला के चूर्णों से जल-कलशों काे भरा जाता था। ब्राह्मी, क्षेमा या काठ गुगुल, अजा नामक औषधि, सर्वौषधि बीज और अन्‍य मंगल द्रव्‍यों को भी उन कलशों में डाला जाता था। इस विधि से पुष्‍य नक्षत्रगत चंद्रमा का सुयोग देखकर स्‍नान किया जाता था। कई प्रकार के मंत्रों का पाठ किया जाता :
कलशैर्हेमताम्रैश्‍च राजतैर्मृण्‍मयैस्‍तथा।
सूत्र संवे‍ष्टितग्रीवै: च चन्‍दननागरु चर्चितै:।
प्रशस्‍त वृक्ष पत्रैश्‍च फलपुष्‍प समन्वितै:।
पुण्‍यतोयेन संपूर्णै रत्‍नगर्भै: मनोहरै:।। (बृहत्‍संहिता में गर्गोक्ति 48, 38)

यह स्‍नान सुरूप, स्‍वास्‍थ्‍य, समृद्धि, सुख, विजय आदि के उद्देश्‍य से होता था। जैसा कि वराहमिहिर ने भी इस विधि को लिखा है लेकिन यह विधि लिंगादि पुराणों में भी है, जाहिर है यह लोकप्रिय रही है।

यह भी ज्ञेय है कि रूप चतुर्दशी धातु पूजन का अवसर भी है। रूप का आशय है चांदी। चांदी के सिक्‍के से ही हमें रूपया शब्‍द मिला है जिसको पहले ‘रुप्‍यकाणि’ या ‘रूपा’ कहा जाता था। कुबेर की पहचान उसकी नौली से रही है। ‘नौली’ से आशय है कमर या हाथ में रखने योग्‍य रूपयों की थैली। यक्षों की मूर्तियों के साथ नौली का अंकन मिलता है। भारत में विशेषकर भंडारों में कुबेर की स्‍थापना की जाती थी, अर्थशास्‍त्र में यह संदर्भ मिलता भी है। लक्ष्‍मी प्रारंभ में इंद्र के साथ थी, फिर कुबेर के साथ और कालांतर में विष्‍णु के वामभाग में आई। जब भार्गवों ने उसे अपनी पुत्री के रूप में स्‍वीकारा। अन्‍यथा वह कुबेर के साथ ही स्‍वीकारी गई।

उत्‍तर वैदिक ‘श्रीसूक्‍त’ में इसका विवरण आया है, उसमें कुबेर यक्ष का नाम देवसख: और उनके मित्र मणिभद्र नाम आया है, उनके ही आगमन से कीर्ति, मणियां मिलती हैं- उपैतु मां देवसख: कीर्तिश्‍च मणिना सह। प्रादुभूतोऽस्मि राष्‍ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धि ददातु मे। (श्रीसूक्‍त 7)
यह प्राचीन संदर्भ है और इतना महत्‍वपूर्ण है कि यामलों से लेकर छठवीं सदी के विष्‍णुधर्मोत्‍तरपुराण तक में यह सूक्‍त आया है। महालक्ष्‍युपनिषद में भी इसका अंशांश मिल‍ता है। देखने वाली बात ये है कि यह लक्ष्‍मी के रूप में सुवर्ण और चांदी की खानों से मिलने वाले पाषाणखंडों को प्रद्रावित कर धातु प्राप्‍त करने के लिए जातवेद या अग्नि से प्रार्थना की गई है- तां म आ वह जातवेदो लक्ष्‍मीमनपगामिनीम्। कार्तिक ही वह अवधि होती थी जबकि खानों में खुदाई का काम फिर से शुरू होता था…। आज प्रसंगवश यह स्‍मरण हो आया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *