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त्याग, राष्ट्रभक्ति और स्वामिभक्ति का अमर प्रतीक : दानवीर


◆पुण्यतिथि 16 जनवरी पर विशेष◆
स्वातंत्र्य-वीर, राष्ट्र-वीर, दान-वीर मेवाड़ी सपूत भामाशाह का नाम भारतीय इतिहास में त्याग, निष्ठा और मातृभूमि-प्रेम का पर्याय है। वे ऐसे विरल व्यक्तित्व थे, जिनका जीवन स्वयं में राष्ट्रधर्म की जीवंत मिसाल बन गया।
दानवीर भामाशाह का जन्म 28 जून 1547 ई. (आषाढ़ शुक्ल 10, संवत 1604) को वैश्य कुल, श्वेताम्बर ओसवाल जैन कावड़िया परिवार में हुआ। भगवान महावीर के मूलमंत्र अपरिग्रह को उन्होंने अपने जीवन का आधार बनाया और संग्रहण की प्रवृत्ति से सदैव दूर रहे। उनकी पुण्यतिथि 16 जनवरी 1600 ई. है।
■ मेवाड़ और महाराणा प्रताप से अटूट नाता ■
भामाशाह को अपनी मातृभूमि मेवाड़ से अगाध प्रेम था। वे बचपन से ही महाराणा प्रताप के अभिन्न मित्र, सखा और आगे चलकर उनके प्रमुख सलाहकार बने। भामाशाह के पिता भारमल कावड़िया को महाराणा सांगा ने रणथंभौर दुर्ग का किलेदार नियुक्त किया था। बाद में महाराणा उदय सिंह ने उनकी कर्तव्यनिष्ठा से प्रभावित होकर उन्हें मेवाड़ की राजधानी उदयपुर बुलाया और राज्य के प्रमुख पद पर आसीन किया।
■ संकट की घड़ी और इतिहास बदल देने वाला दान ■
महाराणा प्रताप की कठिन समय में सबसे पहले सहायता का हाथ बढ़ाने वाले भामाशाह ही थे। अरावली के घने जंगलों में भामाशाह ने अपने बड़े भाई ताराचंद कावड़िया के साथ महाराणा प्रताप से भेंट की और अपनी सम्पूर्ण धन-संपदा मातृभूमि की रक्षा हेतु अर्पित कर दी।
इतिहासकारों के अनुसार, यह सहायता इतनी बडी आथी कि उससे 25,000 सैनिकों का बारह वर्षों तक भरण-पोषण संभव था। संगठन, सैन्यबल और निर्णायक भूमिका
भामाशाह ने केवल आर्थिक सहायता ही नहीं दी, बल्कि महाराणा प्रताप के लिए सैन्यबल और सहयोग भी जुटाया। मेवाड़ की सेना को एकजुट करने में उनका योगदान निर्णायक रहा।
उनकी स्वामिभक्ति और कुशल प्रशासन से प्रभावित होकर महाराणा प्रताप ने भामाशाह को मेवाड़ का प्रमुख प्रधान नियुक्त किया और राज्य के कोष तथा लेखा-जोखा का पूर्ण दायित्व सौंपा।
दिवेर सहित मुगलों के शाही थानों पर आक्रमण में भी भामाशाह ने मेवाड़ी सेना का नेतृत्व करते हुए अद्भुत वीरता का परिचय दिया। हल्दीघाटी से लेकर बाद के सभी प्रमुख युद्धों में वे महाराणा के साथ छाया की भांति उपस्थित रहे।
■राजकोष का रक्षक और वंश परंपरा ■
राजकोष को विभिन्न स्थानों पर सुरक्षित रखने में भामाशाह की अद्वितीय दक्षता के कारण मुगलों को मेवाड़ में लूटपाट का अवसर नहीं मिला। मृत्यु से पूर्व उन्होंने राजकोष से संबंधित समस्त बही-खाते अपनी पत्नी को सौंपते हुए निर्देश दिया कि इन्हें सुरक्षित महाराणा अमरसिंह तक पहुंचाया जाए।
महाराणा प्रताप के पश्चात अमरसिंह ने भामाशाह के पुत्र जीवाशाह को प्रमुख प्रधान नियुक्त किया। आगे चलकर महाराणा करण सिंह ने भामाशाह के पौत्र अक्षयराज को यही पद सौंपा। इस प्रकार भामाशाह की चार पीढ़ियां मेवाड़ की सेवा में रहीं।
सम्मान, स्मृति और विरासत
महाराणा स्वरूप सिंह और महाराणा फतेह सिंह ने भामाशाह के सम्मान में राजाज्ञा जारी की कि मेवाड़ राजवंश के किसी भी सामूहिक भोज से पूर्व भामाशाह के प्रमुख वंशज का तिलक किया जाए। भामाशाह की समाधि उदयपुर में मेवाड़ के प्रमुख महाराणाओं की समाधियों के मध्य आयड़ स्थित महासतियां में स्थित है। चित्तौड़ दुर्ग के तोपखाने के सामने उनकी हवेली आज भी उनके गौरवशाली अतीत की साक्षी है, जिसका आंशिक जीर्णोद्धार भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा किया गया है।
31 दिसंबर 2000 को भारत सरकार ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भामाशाह के सम्मान में डाक टिकट जारी किया। राजस्थान सहित देश के अनेक राज्यों में भामाशाह के नाम पर योजनाएं संचालित हैं।
आज “भामाशाह” नाम दान, त्याग और राष्ट्रसेवा का प्रतीक बन चुका है—एक ऐसा दीप, जो सदियों बाद भी भारतीय चेतना को प्रकाश देता है।


-डॉ. विजय विप्लवी, उदयपुर

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