
(पुण्य तिथि 11 फरवरी पर विशेष)
-डाॅ. विजय विप्लवी-
‘चेरैवेति-चरैवति‘ के वेद मंत्र का जीवन में अंगीकार करने वाले, माँ भारती के लाडले सपूत पं. दीनदयाल उपाध्याय को शुचितापूर्ण राष्ट्रवादी, सिद्धान्तनिष्ठ राजनीति के ‘आचार्य‘ की उपमा से जाना जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, जिस प्रकार पूज्य आदि शंकराचार्य ने पूरे भारत की प्रदक्षिणा कर सनातन धर्म को नवचैतन्य प्रदान किया, उसी प्रकार राजनीति में पं. दीनदयाल उपाध्याय ने राजनीति में कुशल संगठक के रूप में पूरे भारत की प्रदक्षिणा करके भारतीय राजनीति में एकात्ममानवदर्शन की विचारधारों से प्रेरित आदर्श दल भारतीय जनसंघ (भाजपा का पूर्व स्वरूप) को स्थापित, पुष्पित व पल्लवित किया। स्वयं दीनदयाल जी ने राजनीति में अपने वक्तव्यों में प्रस्तुत आदर्शो को अपने जीवन में भी परिलक्षित करके एक आदर्श प्रस्तुत किया।
25 सितम्बर 1916 को धानक्या (राजस्थान) के रेल्वे स्टेशन क्वार्टर में जन्में शिशु ‘दीना‘ का जीवनभर रेल से अटूट सम्बन्ध रहा। जीवन का अधिकांश समय रेल प्रवास में बीता, मानो रेल का डिब्बा ही उनका घर था। वे एक्सप्रेस रेल के स्थान पर पैसेन्जर रेल में जाना पसंद करते थे। वे कहते थे इससे मुझे रेल में पढ़ने-लिखने का अधिक समय मिल जाता है। आजीवन रेल यात्रा में रहे दीनदयाल जी आखिरी रेल यात्रा में लखनऊ से मुगलसराय (जिसे अब दीनदयाल जंक्शन कहा जाता है) तक रही।
11 फरवरी 1968 को नई दिल्ली में भारतीय जनसंघ संसदीय दल की बैठक होने वाली थी, तो इसी दिन पटना में बिहार प्रदेश भारतीय जनसंघ की कार्यकारिणी बैठक होने वाली थी। 10 फरवरी को भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष पं. दीनदयाल लखनऊ में अपनी मुँहबोली बहिन लता खन्ना के घर ठहरे हुए थे। प्रातः 8 बजे बिहार जनसंघ के प्रदेश मंत्री अश्विनी कुमार ने दीनदयाल जी से फोन पर बात कर उनसे पटना बैठक में सम्मिलित होने का आग्रह किया। दीनदयाल जी ने कहा- ‘यदि भण्डारी जी (श्री सुन्दर सिंह भण्डारी, राष्ट्रीय महामंत्री, भारतीय जनसंघ) ने कल दिल्ली में संसदीय दल की बैठक है, वे भंडारी जी से बात करने के बाद तय करेगें, वे आयेगें या नहीं। भंडारीजी से दिल्ली बात होने के बाद अन्ततोगत्वा पठानकोट- सियालदह एक्सप्रेस से पटना के लिये प्रथम श्रेणी में रेल आरक्षण करवाया गया। यह रेलगाडी लखनऊ से शाम सात बजे चलती है। शाम को उत्तरप्रदेश के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री रामप्रकाश गुप्त व उत्तरप्रदेश विधान परिषद के सदस्य पीताम्बर दास उन्हें स्टेशन पर विदा करने वालों में प्रमुख थे।
दीनदयाल जी के साथ यात्रा में एक सूटकेस, बिस्तर, पुस्तको का झोला व एक टिफिन था। वे सामान्य सी धोती -कुर्ता व सर्दी से बचाव के लिये दो स्वेटर व उसके ऊपर जैकेट पहने व कंधे पर गर्म शाॅल डाले हुए थे। उन्हें सर्दी बहुत लगती थी, इसलिये फरवरी माह में उनकी यह वेशभूषा स्वाभाविक थी।
रेल की उस विशिष्ट बोगी का आधा भाग तृतीय रेणी व आधा प्रथम श्रेणी का था। प्रथम श्रेणी में ‘ए‘, ‘बी‘ व ‘सी‘ कूपे में क्रमशः 4, 2 व 4 सीटें थी। दीनदयाल जी का टिकट ‘ए‘ कम्पार्टमेन्ट में था। इस कूपे में दूसरा टिकट एम. पी. सिंह का था, जो निदेशक थे। ‘बी‘ कूपे में उत्तरप्रदेश विधान परिषद् के सदस्य गौरीशंकर राय के लिये सुरक्षित था, वे वाराणसी जा रहे थे। अध्ययन में सुविधा की दृष्टि से आग्रह करके दीनदयाल जी ने परस्पर सीट परिवर्तित कर ली।

रेल लखनऊ से बाराबंकी, फैज़ाबाद, अकबरपुर, शाहगंज, जौनपुर, वाराणसी और उसके बाद मुगलसराय जंक्शन पर रूकती थी। जौनपुर स्टेशन पर वहाँ के महाराज के सेवक कन्हैया लगभग 12 बजे स्टेशन पर दीनदयाल जी से मिलने आये। रेल के डिब्बे पर लगी आरक्षण सूची में नाम पढ़कर कन्हैया ने दरवाजा खटखटाया, इसी बीच दीनदयाल जी आकर गाडी से उतरे और प्लेटफार्म पर आये। कन्हैया ने महाराज का पत्र दीनदयाल जी को दिया, वे उनके मित्र भी थे। दीनदयाल जी ने पत्र पढ़कर शीघ्र उत्तर देने की बात कही। जौनपुर से रात 12-12 बजे चली यह रेल 2.15 बजे मुगलसराय स्टेशन के प्लेटफार्म एक पर पहुंची। पठानकोट – सियांलदह एक्सप्रेस पटना नहीं जाती थी, इसलिये यह बोगी इस गाडी से काटकर दिल्ली -हावडा में जोड़ दी गई, जो रात 2.50 बजे वहाँ से रवाना हुई। बिहार जनसंघ के अध्यक्ष कैलाशपति मिश्र प्रातः 6 बजे पटना स्टेशन पर दीनदयाल जी के स्वागत के लिये आये। उन्होने लखनऊ से पटना आने वाले डिब्बा नं. 1635 को देखा, वह खाली था। उन्होंने सोचा संभवतः वे भण्डारी जी के आग्रह पर दिल्ली चले गये हो।
इसी बीच उस कालरात्रि में किसी दुष्चक्र ने उन्हें परलोक पहुंचा दिया था। 11 फरवरी 1968 तडके 9.30 बजे मुकामा स्टेशन पर ‘बी‘ कूपे में सीट के नीचे किसी ने एक सूटकेस देखा, वो दीनदयाल जी का ही था। वह रेलवे पुलिस ने जमा कर लिया।
इधर, 11 फरवरी 1968 को रात्रि 3.30 बजे मुगलसराय जंक्शन के ‘लीवर मैन‘ दिगपाल ने सहायक स्टेशन मास्टर को पहले मेनलाईन के दक्षिण की ओर बिजली के खम्बा नं. 1376 के पास एक लाश पड़ी है। सहायक स्टेशन मास्टर ने 3.35 पर रेलवे पुलिस का ‘मीमो‘ भेजा, मीमो पर लिखा था ‘ऑल मोस्ट डेड‘ । पुलिस के दो सिपाही रामप्रसाद व अब्दुल गफ्फुर निगरानी के लिये पहुंच गये। रेलवे के चिकित्सकों ने प्रातः 6.35 बजे घटनास्थल पर पहुंच कर उन्हें ‘मृत‘ घोषित किया। पुलिस ने उनके पास से प्रथम श्रेणी का टिकट नं. 04348 व आरक्षण रसीद नं. 47506, हाथ पर बंधी घड़ी जिस पर नाना देशमुख लिखा था व 26 रूपये मिले, जो पुलिस ने जमा कर लिया।
मौके पर शव की शिनाख्त नहीं हो सकी। पुलिस ने मृतक को अज्ञात मानकर पंचनामा बनाया और अग्रिम कार्यवाही प्रारंभ की। दिन चढने के साथ शव के आसपास भीड़ जमा हो गई, लेकिन अब उन्हें कोई पहचान नहीं पाया था, तभी रेलवे कर्मचारी वनमाली भट्टाचार्य (जो दीनदयाल जी को जानते थे व पहले कई बार मिल चुके थे) ने पुलिस को कहा – ‘ये भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष पं. दीनदयाल उपाध्याय है।‘‘ पुलिस व वहाँ मौजूद लोगो ने उनकी बात पर विश्वास नहीं किया। तब भट्टाचार्य ने मुगलसराय में जनसंघ के कार्यकर्ताओ को सूचित किया। जनसंघ के कार्यकर्ताओं के वहाँ पहुंचने के बाद पुलिस ने आरक्षण टिकिट के आधार पर लखनऊ रेलवे से जानकारी की, तो उक्त टिकट दीनदयाल जी का होने की पुष्टि हो गई।
संघ के संरसंघचालक श्रीगुरूजी गोलवलकर , अटलजी, बलराज जी मधोक को सूचना दी गई। पोस्टमार्टम के बाद पार्थिव देह विमान से दिल्ली लाई गई। दिल्ली में तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. जाकिर हुसैन, उपराष्ट्रपति वी.वी.गिरी, प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी उपप्रधानमंत्री मोरारजी देसाई, लोकसभाध्यक्ष नीलम संजीव रेड्डी सहित अनेक नेताओं व विशिष्टजनों ने उन्हें पुष्पांजलि अर्पित की।
12 फरवरी को अटलजी के निवास स्थान 30, राजेन्द्र प्रसाद रोड़ से अपराह्न एक बजे प्रारंभ हुई, उनकी अंतिम यात्रा लगभग 6 बजे निगम बोध घाट पर पहुंची। अंतिम यात्रा की अपार जनसमूह के मध्य कुछ किलोमीटर की दूरी तय करने में लगभग सवा पाँच घंटे का समय लगा। सायं 7 बजकर 6 मिनट पर मंत्रोच्चार के मध्य दीनदयाल जी के ममेरे भाई श्री प्रभुदयाल शुक्ल ने उनका पार्थिव देह का मुखाग्नि दी। उपस्थित शोक विह्लजन दीनदयाल जी अमर रहे, भारतमाता की जय के घोष के बीच अपने शोक भाव को व्यक्त कर रहे थे।
18 फरवरी 1968 को मंत्रोच्चार के मध्य प्रयाग के संगम में उनकी अस्थियों का विसर्जन प्रभुदयाल शुक्ल, अटल बिहारी वाजपेयी, सुन्दर सिंह भण्डारी, बलराज मधोक, यज्ञदत्त शर्मा ने किया।
भारत माँ का लाल- दीनदयाल, कुत्सित षडयंत्रों के कारण असमय विदा हो गये। जिन परिस्थितियों में वे गये, वे हृदय विदारक थी। उनकी हत्या की जाँच के लिये आयोग भी बना, सीबीआई जाँच भी हुई लेकिन कोई संतोषजनक निष्कर्ष ही मिला उनका महाप्रयाण आज भी एक रहस्य है। उनकी हत्या से सम्बन्धित कई प्रश्न आज भी अनुत्तरित है। काल के क्रूर चक्र ने भारतमाता से उसका लाडला सपूत छीन लिया। समय के विपरीत झंझावतों में ‘धानक्या से ‘मुगलसराय‘ तक की अनथक यात्रा तय करने वाले पं. दीनदयाल भारतीय संसद् के सदस्य नहीं रहें, लेकिन संसद् की कार्यवाही रोककर उन्हे संसद् में श्रद्धाजंलि अर्पित की गई।
वे कभी किसी भी सदन के निर्वाचित जनप्रतिनिधि नहीं रहे, लेकिन वे ऐसे कार्यकर्ताओं के कुशल शिल्पी बने, जिन्होनें संगठन व राष्ट्र को दिशा प्रदान की। कुशल संगठक चिन्तक व माँ भारती के आराधक पं. दीनदयाल उपाध्याय को शत -शत नमन्।
(लेखक दीनदयाल उपाध्याय के विषय में शोध व पुस्तक लेखन कर चुके है)
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पं. दीनदयाल उपाध्याय: संक्षिप्त जीवन – वृत्त
1916 : 25 सितम्बर (आश्विन कृष्ण त्रयोदशी विक्रम सम्वत् 1973 विक्रमी) सोमवार को जयपुर जिले के धानक्या में जन्म।
1616: पिता भगवती प्रसाद का स्वर्गवास।
1924: माँ रामप्यारी का स्वर्गवास।
1925: मामा राधारमण के यहाँ गंगापुर सिटी (राजस्थान) में प्राथमिक शाला में प्रवेश।
1932: राजगढ़, राजस्थान में कक्षा आठ में प्रवेश।
1937: छोटे भाई शिवदयाल का देहान्त। सीकर में दसवीं कक्षा में प्रवेश।
1935: इण्टरमीडिएट बोर्ड में सर्वप्रथम। सभी विषयों में विशेष योग्यता। बोर्ड द्वारा स्वर्गपदक। सनातन धर्म काॅलेज कानपुर में बी.ए. में प्रवेश। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रवेश।
1939: बी.ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण। सेण्ट जाॅन काॅलेज आगरा में एम.ए. हेतु प्रवेश। संघ शिक्षा वर्ग का प्रथम वर्ष किया।
1942: संघ शिक्षा वर्ग का द्वितीय वर्ष। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जिला प्रचारक होकर लखीमपुर-खीरी गये।
1947: राष्ट्रधर्म प्रकाशन की लखनऊ में स्थापना।
1948-49: संघ से प्रतिबन्ध हटाने के लिए सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में सत्याग्रह संचालन का दायित्व। ‘पांचजन्य‘ पर प्रतिबन्ध लगने पर क्रमशः ‘हिमालय‘ तथा ‘राष्ट्रभक्त‘ पत्रों का प्रकाशन।
1951: 21 सितम्बर को उत्तर प्रदेश में प्रादेशिक जनसंघ की स्थापना।
1951: 21 सितम्बर को दिल्ली में डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ की स्थापना।
1953: 1 जनवरी को कानपुर अधिवेशन में जनसंघ के अखिल भारतीय महामन्त्री नियुक्त। कश्मीर सत्याग्रह का संचालन।
1963: जौनपुर से लोकसभा का चुनाव लडे। भारत मैत्री समिति के निमंत्रण पर सितम्बर-अक्टूम्बर में अमरीका यात्रा।
4-5 जून 1964 : उदयपुर के बीएन कॉलेज में संघ शिक्षा वर्ग में सर्व प्रथम एकात्ममानववाद पर दो बौद्धिक दिये।
1965: ‘एकात्म मानववाद‘ का सर्वप्रथम ग्वालियर में जनसंघ की प्रतिनिधि सभा में प्रस्तुतिकरण।
1967: भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष।
1968: 11 फरवरी को मुगलसराय स्टेशन पर जीवन-यात्रा की विश्रांति
-डाॅ. विजय विप्लवी-
पूर्व पार्षद, उदयपुर
