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नंदनी माता के आंगन में सजी दिव्य रासलीला, श्रद्धा-परंपरा और भावनाओं का अनुपम संगम

बडोदिया। वागड़ का पावागढ़ उपनाम से प्रसिद्ध नंदनी माता तीर्थ का पावन प्रांगण उस समय साक्षात् वैकुंठ सा प्रतीत हुआ, जब बुनकर समाज द्वारा आयोजित भव्य रासलीला में भगवान की समस्त दसों कलाओं की विधाओं का अत्यंत भावनात्मक और सजीव मंचन किया गया। मां नंदनी की साक्षी में कलाकारों ने जिस तन्मयता, श्रद्धा और आत्मसमर्पण भाव से रासलीला प्रस्तुत की, उसने उपस्थित हर श्रद्धालु के हृदय को छू लिया।
रासलीला के यजमान रमणलाल पिता कालूजी बुनकर ने भावुक स्वर में बताया कि वर्षों की साधना और प्रतीक्षा के बाद नंदनी माता तीर्थ पर भगवान के समक्ष रास करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। उन्होंने कहा कि यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि भगवान के चरणों में समाज की आस्था और समर्पण का भावपूर्ण अर्पण है।
मुख्य कलाकार पन्नालाल ने बताया कि रासलीला का शुभारंभ पंच ऋषियों की वाणी से होता है, जिसके माध्यम से समस्त कलाकार एक स्वर में आगम वाणी का गान कर भगवान को रिझाते हैं। विधाता, सृष्टि और वर्तमान युग का वर्णन करते हुए यह बताया जाता है कि किस प्रकार पीढ़ी दर पीढ़ी मानव भगवान पर अटूट विश्वास रखता आया है। जैसे-जैसे वाणी आगे बढ़ती है, वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठता है।
कार्यक्रम के दौरान मां अंबे के कलश आगमन ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। प्रथम मनसा रूपधारी कलाकारों ने “सातो सरोवर साल्यां रो…” जैसे भक्तिमय गीतों के साथ मां अंबे का रूप धारण कर, सिर पर कलश और हाथों में तलवार लेकर जो कला दिखाई, वह शक्ति, भक्ति और साहस का अद्भुत प्रतीक बनी। इसके पश्चात भगवान शंकर नंदी पर सवार होकर पधारे और मां पार्वती से विवाह प्रसंग में चारों युगों की वाणी का मार्मिक वर्णन हुआ, जिसे सुनकर श्रद्धालु भावनाओं में डूब गए।


प्रातःकाल बीजो कौरव तथा अन्य रूपों के बाद जब भगवान श्रीकृष्ण का मुकुट धारण कर कलियुग का वर्णन किया गया, तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो स्वयं श्रीकृष्ण उपस्थित होकर मानव को धर्म, मर्यादा और भक्ति का संदेश दे रहे हों। पूरी रात चली इस रासलीला में एक-एक प्रसंग श्रद्धा और अनुभूति से जुड़ता चला गया।
कमलेश बुनकर ने बताया कि बुनकर समाज स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण का वंशज मानते हुए सदियों से इस परंपरा का निर्वहन करता आ रहा है। मंदिर प्रतिष्ठा हो या कोई बड़ा धार्मिक अवसर, भगवान को मनाने और अपनी दसों विधाओं के माध्यम से भक्ति अर्पित करना समाज की आत्मा में रचा-बसा है। इस आयोजन में कोदर लाल, लालजी भाई, मोगजी भाई, नंदलाल, मोहन, कपिल, प्रवीन, मोहन भाई सहित अनेक कलाकारों का समर्पण अतुलनीय रहा।
रात दस बजे से प्रातः पांच बजे तक निरंतर चली रासलीला में कलाकारों ने थकान को पीछे छोड़कर भक्ति को आगे रखा और विविध रूपों में प्रस्तुति देकर भक्तों के मन में अमिट छाप छोड़ी। वर्षभर विभिन्न आयोजनों में दर्जनों रासलीलाओं का मंचन करने वाले इन कलाकारों की साधना और सेवा हर प्रस्तुति में झलकती है।
दस विधाओं में साकार हुआ भगवान का स्वरूप
रासलीला में पंच ऋषि विधा, वैदात्रा, अंबाजी, नंदी, कृष्णस, महादेव, ब्राह्मण, पुरवीयों, वुडकर और निष्कलंक अवतार—इन दसों लीलाओं का ऐसा भावपूर्ण मंचन हुआ कि श्रद्धालुओं को अनुभूति हुई मानो भगवान निष्कलंक स्वयं अवतरित होकर मां नंदनी के आंगन में रास रच रहे हों।

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