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देशभर के बंजारों का मूल तीर्थ

  • श्रीकृष्ण ” जुगनू “
    अपनी रीतियों और नीतियों के लिए दुनियाभर में जाने जाते हैं बंजारे। उनके साथ कारवाँ शब्द जुड़ा है जो उनके निरंतर यायावर रहने और उनकी गृहस्थी के भी यात्रा में रहने का सूचक है। मध्यकाल तक बंजारों की मुसाफिरी या यायावरी इतनी लोकप्रिय रही कि भक्तों के भजनों में आत्मा को बंजारा कहा गया और प्रतीक रूप में कहा गया कि बंजारों की तरह आत्मा देह – देह में भटकता हुआ रिश्ते रचता है और फिर छोड़कर चला जाता है। संसार को असारता को बताता है बंजारा। गीत है : बस्ती बस्ती परबत परबत गाता जाए बंजारा…।

वह – कहीं चूड़ी बेचने वाला वणजारा है तो कहीं गल्ला ले जाने वाला बणजारा। सिंधु से लेकर नील नदी तक और वितस्ता से कृष्णा तक बंजारों ने व्यापार किया है। हिमगिरि से सहयाद्रि तक की तलहटी मे उनकी बालद के टांडे लगे हैं। वे जहां कहीं रुकते, वहां तालाब बने, बावड़ियां बनीं या सरोवर लहरदार हुए । कोई खेत बंजारों का न हो लेकिन ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहां बंजारे नहीं पहुंचे हो। इंसान की जरूरतों को बंजारों ने पूरा किया। बंजारा इसीलिए बीरा ( भाई ) भी कहे गए : तालरिया मगरिया रे, आयो आयो धोरा वालो देस, बीरो बंजारो रे…।

मेवाड़ के बंजारा लाखा की पहचान से कहे गए। क्योंकि, 14 वीं सदी में चित्तौड़गढ़ के महाराणा लाखा के आश्रय में उन्होंने मेवाड़ जैसे खदान बहुल प्रदेश की नई पहचान बनाई। उनके पास लाख बैल होने की मान्यता का आधार नहीं। लक्खा शाह नाम का एक और बंजारा हुआ जो 16 – 17 वीं सदी के आसपास की घटना का पात्र हुआ। मेवाड़ में बंजारा गवरी जैसे प्राचीन, भील आदिवासियों के नृत्य नाटिका का हिस्सा रहे हैं। नाटिका का नाम है : बंजारे की बालद। उसमें वह नायक है और रास्ते में उसकी पत्नी को दाणी फुसला लेता है। तब बंजारा नई पत्नी लाता है और बालद ( बैलों का कारवां) को वापस फेरने वाले दाणी को अपना बल दिखाता है। यह चोट का ख्याल कहा जाता है। ( गवरी : प्राचीनतम प्रस्तुति कला : श्रीकृष्ण जुगनू)

देसी बंजारे बामणिया बंजारे भी कहे जाते हैं क्योंकि उनका मुख्य मंदिर राजसमंद जिले में बनास नदी के तट पर बसे बामणिया गांव में है। उनका नायक रूपाजी बंजारा या रूपा नायक थे। रूपाजी जी की कहानी मैंने अपने गांव आकोला के पास के झूंपा ( पारी का खेड़ा ) में जवान बंजारा से सुनी थी। क्यों उसको फिरता राजा कहा गया ? बामणिया में देश ही नहीं, विदेशों के भी बंजारा, जिप्सी आदि आते हैं। मैं भी कई बार ऐसे दलों और यात्रियों के साथ वहां गया हूं।

आजकल इस मंदिर का जीर्णोद्धार हो रहा है। जीर्णोद्धार से अधिक इस कार्य को नव निर्माण कहा जा सकता है। कुछ समय पहले मैंने बामणिया की यात्रा की थी, तब कार्य की प्रगति देखने को मिली थी। रोचक बात है कि अनेक समुदायों में जो अपने को बामणिया बताते हैं, उसका एक कारण इस गांव से संबंधित होना भी है। एक बार बनास की बाढ़ और लंबे काल तक जलभरण के कारण लोगों को पलायन का सामना करना पड़ा। यह गांव सिंधु घाटी सभ्यता के समकालीन गीलुंड और छतरी खेड़ा के बाजू में बसा है। सिंधु सभ्यता के उजाड़ होने के कारणों की उलझन को बामणिया गांव से जोड़कर सुलझाया जा सकता है।

बंजारों के लिए आदेश अभिलेख :

राजस्थान के नारलाई के आदिनाथ जैन मंदिर से एक ऐसा अभिलेख मिला है जिसमें को बंजारों से कहा गया है कि यदि उनका कारवां नारलाई से गुजरेगा तो प्रत्येक बैल पर और प्रत्येक गाड़ी पर लादे गए भार के अनुसार लागत देगा। इस अभिलेख में दो प्रकार के बंजारों का उल्लेख है :

  1. अभिनवपुरिया यानी नवापुर वाले जो बोलचाल में बारदिया कहे जाते थे और
  2. बंजारे जो देशी कहे जाते थे और संस्कृत में वाणिज्यारक लिखे जाते थे।

मेवाड़ में आज भी बंजारों के उक्त दोनों समुदायों की मान्यता है। दोनों के बीच भोजन व्यवहार है। लबाना भी है। मैंने तर्जेला, बालद, टांडा, झूंपा जैसे गाँवों में गणगौर पर्व के अध्ययन के दौरान इनकी रीतियों को देखा और समझा।

नारलाई का अभिलेख नाडोल के चौहान शासक रायपाल के शासनकाल (विक्रम सम्वत 1202) ईसवी सन 1145 का है और एपिग्राफिया इंडिका के भाग 11 (1911 -12 ई.) में प्रकाशित है। यह संवत् 1202 आश्विन कृष्णा 5 शुक्रवार का है। इसमें 1’8″ × 44″ पाषाण के भाग में नागरी लिपि में 5 पंक्तियाँ उत्कीर्ण हैं। भाषा संस्कृत और यह गद्य में है।

तब नाडलाई का ठाकुर रावत राजदेव था जिसने वहां के महावीर चैत्य के तपोधनी साधुओं के दान की व्यवस्था की। इसमें अभिनवपुरी के बदर्या (बारद वाले) तथा अन्य देशी मिलकर समस्त बनजारों पर प्रति 20 पाइल भारवाले वृषभ पर 2 रुपया तथा धर्म के निमित्त गाडे के भार पर 1 रुपया लेना निर्धारित किया। इसका पालन न करने वाला सहस्त्र गौ-हत्या और सौ ब्रह्म-हत्या के पाप का भागी घोषित किया गया। लेख में कई ऐसे शब्द जो स्थानीय भाषा में संस्कृत में प्रयुक्त किये गये हैं, जैसे देसी, किराडर (किराणा, गल्ला), गाड (गाडी, छकड़ा) व लगमान (लाग – बाग), बदर्या (बारद, बारदिया) आदि ।

इसका मूल पाठ इस प्रकार है :

  1. ओं।। संवत् 1202 आसोज वदि 5 शुक्रे। श्रीमहाराजाधिराज श्रीरायपाल देव राज्ये प्रवर्त[ माने]
  2. श्रीश्रीनदलडागिकायां (।) रा. राजदेव ठकुरेण प्रव (र्त)मानेन श्रीमहावीर चैत्ये (l) साधुत
  3. पोधननि (ष्ठार्थे) श्री अभिनवपुरीय (।) बदार्या अ(त्रे)षु स(म)स्तवणजारकेषु (।) देसी मिलित्वा वृ
  4. (ष) म[भ]रित (।) जतु पाइला लगमाने (।) ततु वीसं प्रति (।) रुआ 2 किराडउआ (।) गाडं प्रति रु. 1 वणजार कै [ध]र्म्माय प्रदत्त।। लोपकस्य ज[तु] पापं [ गो] हत्या सहस्रेण।। ब्रह्महत्यास( श)तेन पापेन ( ।) लिप्यते स:।। ( एपिग्राफिया इंडिका)

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