रचनाकार . डॉ.विजय विप्लवी
जाति पूछकर न्याय जो, दे नीति नया विधान,
समानता के नाम पर, बढ़ता मन में संदेह-भान।
बढ़ता मन में संदेह-भान, क्या सवर्ण न पीड़ित,
एक को न्याय-आश्वासन, दूजे को भय-आतंकित।
कह विप्लवी कविराय, सच्ची समानता का मान,
सब वर्गों की सहभागिता, हो समिति पहचान।
झूठी शिकायत दुरुपयोग, दंड प्रावधान हटाय,
निर्दोषों के अधिकारों पर, क्यों मौन नीति छाय?
क्यों मौन नीति छाय, न्याय-सुनवाई सबको,
हर छात्र को निर्भय मिले, भेद न हो मन को।
कह विप्लवी कविराय, विभाजन नहीं समाधान,
न उपेक्षा, न भय का साया, न वर्गीय अवमान।
समानता बढ़े सबके लिए, न रहे कोई वंचित,
न नीति से भय उपजे, न कोई रहे आहत।
न रहे कोई आहत, सभी छात्र हो सुरक्षित,
एक को न्याय, दूजे को भय—ये न्याय नहीं, अन्याय।
कह विप्लवी कविराय, यही लोकतंत्र की पहचान,
भेदभाव रहित वातावरण, बने शिक्षा की शान।
डॉ. विजय विप्लवी
एडवोकेट
