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दर्शकों का खूब मनोरंजन करते हैं गवरी नृत्य के ‘शिव-भस्मासुर’

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राजस्थान के लोक नृत्यों में भील जनजाति द्वारा किया जाने वाला गवरी लोक नृत्य काफी प्रसिद्ध है। यह नृत्य भील बाहुल्य क्षेत्रों जैसे उदयपुर, डूंगरपुर, सिरोही और बांसवाड़ा में काफी लोकप्रिय है। लोक नृत्यों के प्रदर्शन से लोगों में अपनी संस्कृति और धर्म के प्रति आस्था बनी रहती है, साथ ही मनोरंजन भी खूब किया जाता है। इस भाव को जीवंत बनता है भील समुदाय का गवरी नृत्य है। इस नृत्य में शिव-भस्मासुर की पौराणिक कथा को नृत्य नाटिका के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।

यह नृत्य भाद्रपद महीने में 40 दिनों तक किया जाता है। इसमें भीलों के आराध्य देवता शिव की कथा है जिसमें भगवान शिव को तपस्या से प्रसन्न कर भस्मासुर द्वारा भस्मी नामक कड़ा वरदान में पाना व उस कड़े से भगवान शिव को ही भस्म करने के प्रयास, भगवान विष्णु द्वारा मोहनी रूप धारण कर राक्षस के वध की कथा को मनोरंजक तरीके से दिखाया जाता है।

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इसका नायक राई बुढ़िया होता है, जो शिव तथा भस्मासुर का प्रतीक है। उसकी वेशभूषा विशिष्ट होती है। उसके हाथ में लकड़ी का खांडा, कमर में छोटे घुंघरूओं की पट्टी बंधी होती है। मुख पर विचित्र प्रकार का मुखौटा होता है। गवरी के पात्रों में झामटिया कथा को सुनाता है तथा कूटकड़ियां अपनी कुटकड़ाई शैली में गवरी नृत्य में हास्य व्यंग्य से दर्शकों का मनोरंजन करता है।

इस नृत्य में मुख्यतः चार प्रकार के पात्रों की अवधारणा होती है। देव कालका तथा शिव एवं पार्वती के साथ ही अन्य पात्र इस प्रकार हैः- बुढ़िया, राई, कूट-कड़िया। दानव पात्रों में भंवरा, खडलियाभूत, हठिया, मियावाड़। पशु पात्रः- सुर (सुअर), रीछड़ी (मादा रीछ), नार (शेर) इत्यादि। ये सभी पात्र दर्शकों का खूब मनोरंजन करते हैं।

इस नृत्य की खास बात यह है कि इसमें सभी कलाकार पुरुष होते हैं। औरत का अभिनय भी वे स्वयं ही करते हैं। गवरी के पात्र पूरे सवा महीने तक एक ही पोशाक धारण किये रहते है। इस नृत्य में मृदंग तथा जालर वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है।

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