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एकाग्रता असंभव नही है

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भक्ति के क्षेत्र में एकाग्रता का बहुत महत्व है इसकी उपयोगिता भी नि:संशय है, इसकी साधना करनी चाहिये। यह असंभव नही है, यूं तो व्यक्ति अपने निजी कार्यों के संदर्भ में अनेक बार एकाग्र होता ही है। एकाग्रता के बिना सुर्इ की नोक में धागा भी नही पिरोया जा सकता। एकाग्र हो जाना अपने स्वभाव में है किन्तु भक्ति साधना और स्वाध्याय के क्षे़त्र में एकाग्र होने के लिये साधना करनी पडती है। सर्व प्रथम हमें अपने देह को साधना चाहिये शरीर के अंग प्रत्यंग और अपनी दृष्टि को एकाग्र बनाये इसके लिये ढृढता से प्रयास करना चाहिये। अभ्यास से यह संभव होगा।
एकाग्रता से अपनी जीवनी शक्तियों का ह्रास होना रूक जाता है। जीवनी शक्तियां सीमित है इन्हे व्यर्थ नही खोना चाहिये। एकाग्रता से ही हम उन्हे बचा सकते है और अपनी उर्जा के उपयोग की दिशा बदल सकते है।
_ पिन्टु

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